Fundamental Privileges in Hindi

4. मौलिक अधिकारों पर रोक:

यदि सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है, तो नागरिक सरकार के विरुद्ध न्यायपालिका की शरण में जा सकता है । सर्वोच्च न्यायालय उक्त कार्रवाई को अवैध घोषित कर सकता है ।

भारतीय संविधान के 352वें अनुच्छेदानुसार राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल घोषित किये जाने पर भाषण, विचार, अभिव्यक्ति, शान्तिपूर्ण सभा करने, निःशस्त्र प्रदर्शन करने, सभा या समुदाय बनाने, देश में भ्रमण करने तथा किसी भाग में बसने की स्वतन्त्रता स्थगित हो जाती है ।

व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका द्वारा निर्मित कानून न्यायालय भी इसे अवैध घोषित नहीं करेंगे । आपातकाल में संवैधानिक उपचारों के अधिकारों पर भी स्थगन लग जाता है ।

मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) पर निबंध – three or more (400 शब्द)

प्रस्तावना

भारतीय संविधान में शामिल मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) यह सुनिश्चित करने का एक तरीका है कि लोग देश में सभ्य जीवन जीते हैं। इन अधिकारों में कुछ अनोखी विशेषताएं हैं जो आमतौर पर अन्य देशों के संविधान में नहीं मिलती हैं।

मौलिक अधिकारों(फंडामेंटल राइट्स)केविशिष्टलक्षण

मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) पूर्ण नहीं हैं वे उचित सीमाओं के अधीन हैं। वे एक व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के बीच स्थिरता को निशाना बनाते हैं लेकिन उचित प्रतिबंध कानूनी समीक्षा के अधीन हैं। यहां इन अधिकारों की कुछ विशिष्ट विशेषताओं पर एक नजर डाली गई है:

  • सभी मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) को निलंबित किया जा सकता है। देश की सुरक्षा और अखंडता के हित में आपातकाल के दौरान स्वतंत्रता के अधिकार को स्वचालित रूप से निलंबित कर दिया जाता है।
  • अनेक मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) भारतीय नागरिकों के लिए हैं लेकिन कुछ मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) का फायदा देश के नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के द्वारा उठाया जा सकता है।
  • मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) में संशोधन किया जा सकता है लेकिन उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता है। मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) को खत्म करने से संविधान की बुनियादी नीवं का उल्लंघन होगा।
  • मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) दोनों सकारात्मक और नकारात्मक हैं। नकारात्मक अधिकार देश को कुछ चीजें करने से रोकते हैं। यह देश को भेदभाव करने से रोकता है।
  • कुछ अधिकार देश के खिलाफ उपलब्ध हैं। कुछ अधिकार व्यक्तियों के विरुद्ध उपलब्ध हैं।
  • मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) न्यायसंगत हैं। अगर किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) का उल्लंघन होता है तो वह न्यायालय में जा सकता है।
  • कुछ बुनियादी अधिकार रक्षा सेवाओं में काम करने वाले व्यक्तियों के लिए उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि वे कुछ अधिकारों से प्रतिबंधित हैं।
  • मौलिक अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) प्रकृति में राजनीतिक और सामाजिक हैं। भारत के नागरिकों को कोई आर्थिक अधिकार की गारंटी नहीं दी गई है हालांकि उनके बिना अन्य अधिकार मामूली या महत्वहीन हैं।
  • प्रत्येक अधिकार कुछ कर्तव्यों से सम्बन्धित है।
  • मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) का एक व्यापक दृष्टिकोण है और वे हमारे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक हितों की रक्षा करते हैं।
  • ये संविधान का एक अभिन्न अंग हैं। इसे आम कानून से बदला या हटाया नहीं जा सकता।
  • मौलिक अधिकार हमारे संविधान का अनिवार्य हिस्सा हैं।
  • चौबीस आर्टिकल इन बुनियादी अधिकारों के साथ शामिल हैं।
  • संसद एक विशेष प्रक्रिया द्वारा मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) में संशोधन कर सकती है।
  • मौलिक अधिकार का उद्देश्य व्यक्तिगत हित के साथ सामूहिक हित बहाल करना है।

निष्कर्ष

ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिससे संबंधित कोई दायित्व नहीं है। हालांकि यह याद रखने की बात है कि संविधान ने बड़े पैमाने पर अधिकारों का विस्तार किया है और कानून की अदालतों के पास अपनी सुविधा के अनुरूप कर्तव्यों को मरोड़ना-तोड़ना शामिल नहीं है।

मौलिक-अधिकारों का वर्गीकरण:

भारतीय नागरिकों को 6 मौलिक अधिकार प्राप्त हैं: –(1)समानता का अधिकार(Right to Equality): -अनुच्छेद 14 से 18 तक(2)स्वतंत्रता का अधिकार(Right to Freedom): -अनुच्छेद nineteen से twenty-two तक(3)शोषण के विरुद्ध अधिकार(Right against exploitation): – अनुच्छेद 23 से 24 तक(4)धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार(Right to freedom of Religion): -अनुच्छेद 25 से 28 तक(5)सांस्कृतिक तथा शिक्षा संबंधित अधिकार(Cultural and Educational Rights): -अनुच्छेद 30 से 30 तक(6)संवैधानिक उपचारों का अधिकार(Right to Constitutional remedies): -अनुच्छेद 32

(3) शोषण के विरू़द्ध अधिकार (23 से 24 तक)

  • अनुच्छेद 23 के अनुसार मानव व्यापार व बेगार तथा बलात श्रम पर प्रतिबंध लगाया गया है । लेकिन राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिएसार्वजनिक सेवा या श्रम योजना लागू कर सकती है। राज्य इस सेवा में धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। बंधुआ मजदूरी समाप्त करने के लिए 1975 में बंधुआ मजदूरी का उन्मूलन अधिनियम पारित किया गया ।
  • अनुच्छेद twenty four के अनुसार बाल श्रम का निषेध किया गया है जिसके अनुसार 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बच्चे को कारखानो, खदानों या खतरनाक कार्यों में नहीं लगाया जा सकता ।

मूल अधिकार की उत्पत्ति (Origin of fundamental rights)

->मूल अधिकार का जन्म 1215 में ब्रिटेन में हुआ था | 1215 के इस अधिकार पत्र को ‘मौलिक अधिकारों’ का मैग्नाकार्टा कहा जाता है|->फ्रांस विश्व का प्रथम देश था जिसने 1789 के क्रांति (फ्रांस की क्रांति) के बाद लागू नए संविधान में नागरिकों को मूल अधिकार प्रदान किए|->1791 ई. में अमेरिकी संविधान में किए गए प्रथम 10 संशोधन के तहत नागरिकों को संविधान के माध्यम से व्यवस्थित रूप में मूल अधिकार प्रदान किए| इन्ही 10 संशोधनों को सामूहिक रूप से ‘बिल ऑफ राइट’ कहा जाता है|->UNO की समाजिक एवं आर्थिक परिषद् ने 1946 में ‘एलोनोर कजवेल्ट’ की अध्यक्षता में मानवाधिकार आयोग का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट UNO को जून 1948 में सौंपी | इसी रिपोर्ट के आधार पर 10 दिसंबर 1948 को UNO ने मानवाधिकारों को मान्यता प्रदान की| इसी कारण प्रतिवर्ष 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है|

साधारण विधिक अधिकारों व मौलिक अधिकारों में अंतर

साधारण विधिक अधिकार अधिनियमों द्वारा प्रदान किये जाते हैं तथा उनकी रक्षा की जाती है, जबकि मौलिक अधिकार देश के संविधान द्वारा प्रदान किये गये हैं, तथा संविधान द्वारा ही सुरक्षित किया जाता हैं।

साधारण विधिक अधिकार समाप्त या कम किये जा सकते हैं, परन्तु मौलिक अधिकार समाप्त या कम नहीं किये जा सकते हैं।

साधारण कानूनी अधिकारों में सामान्य न्यायालयों द्वारा परिवर्तन किये जा सकते हैं, परन्तु मौलिक अधिकारों में परिवर्तन करने के लिए संविधान में परिवर्तन आवश्यक हैं।

साधारण विधिक अधिकारों का उल्लंघन सामान्य व्यक्तियों, जिसमें विधिक व्यक्ति भी शामिल है, द्वारा किया जा सकता है, जबकि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कुछ अपवादों को छोड़कर केवल राज्य द्वारा ही किया जा सकता हैं।

विधिक अधिकारों से, मौलिक अधिकार सर्वोच्च होता हैं।

3 मौलिक अधिकारों का स्वरूप:

मौलिक अधिकारों के स्वरूप में निम्नलिखित बातें महत्त्वपूर्ण हैं:

(क) समता का अधिकार यह अधिकार इस बात की व्यवस्था करता है कि कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं । जाति, लिंग, स्थान तथा वर्ण आदि के आधार पर राज्य नागरिकों से कोई भेदभाव नहीं करेगा । किसी भी नागरिक को सार्वजनिक भोजनालयों, दुकानों, मनोविनोद, धार्मिक स्थलों पर जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर जाने से नहीं रोका जा सकेगा ।

सभी को राज्य के अधीन नौकरियों में नियुक्ति के अधिकार बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हैं । इस अधिकार में अस्पृश्यता का अन्त कर इसे दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है । सैनिक तथा शिक्षा सम्बन्धी उपाधियों को छोड़कर अन्य सभी उपाधियों और खिताबों को समाप्त कर दिया गया है । इसके अन्तर्गत यह अपवाद है कि सरकार बच्चों, स्त्रियों, अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जातियों को विशेष सुविधा प्रदान करेगी ।

(ख) स्वतन्त्रता का अधिकार:इस अधिकार के अन्तर्गत 6 प्रकार की स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है: 1 . भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता । 2 . शान्तिपूर्ण एकत्र होने की स्वतन्त्रता । several. संघ तथा समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता । 5. भारतीय क्षेत्र के भीतर कहीं भी आने-जाने की स्वतन्त्रता ।

5. व्यापार, आजीविका तथा कारोबार की स्वतन्त्रता । 6. भारत के किसी भी भाग में बसने तथा निवास करने की स्वतन्त्रता । ये सभी स्वतन्त्रताएं मानव विकास के लिए आवश्यक हैं । सरकार देश की प्रमुसता एवं अखण्डता के हित में नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इन अधिकारों को सीमित कर सकती है ।

संविधान में यह महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है कि किसी भी व्यक्ति को अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है । जब तक किसी व्यक्ति ने किसी कानून की अवहेलना का अपराध न किया हो, तब तक उसे जीवन या सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता ।

किसी भी व्यक्ति को गिरफतारी से पूर्व उसका कारण बताना आवश्यक है । प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घण्टे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सम्मुख पेश करना अनिवार्य है । ऐसे व्यक्ति को स्वयं तथा वकील के माध्यम से अपनी सफाई पेश करने का अवसर दिया जाता है । संविधान में इस बात का ध्यान भी रखा गया है कि किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का अनुचित ढंग से उपहरण नहीं होना चाहिए ।

यदि देश की एकता, अखण्डता, शान्ति, सुरक्षा का मामला है, तो उसे 24 घण्टे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष बन्दी बनाये जाने वाले व्यक्ति को पेश करना अनिवार्य नहीं रहता । इसको नजरबन्दी कहते हैं । सामान्यत: किसी व्यक्ति को 3 माह से अधिक समय के लिए नजरबन्द नहीं किया जा सकता । इससे अधिक देर तक नजरबन्द करने के लिए उच्च न्यायालय की सिफारिश के अनुसार नियुक्त मण्डल के समक्ष मामले को रखना पड़ता है ।

मौलिक अधिकारों (फंडामेंटल राइट्स) की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मूल अधिकारों का सर्वप्रथम विकास ब्रिटेन में तब हुआ, जब 1215 में सम्राट जान को ब्रिटिश की जनता ने प्राचीन स्वतंत्रताओं को मान्यता प्रदान करने हेतु मैग्रा कार्टा पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर दिया। इसके बाद ब्रिटिश जनता ने 1689 में सम्राट को उन अधिकारों के विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य कर दिया, जो उनके सम्राट द्वारा समय – समय पर जनता को दिये गये थे।

अमेरिका के मूल संविधान में मौलिक अधिकारों का उल्लेख नहीं किया गया था लेकिन 1791 में दसवें संविधान संशोधन द्वारा अधिकार पत्र (Bill of Rights) को जोड़ा गया। अमेरिका के पूर्व फ़्रांसीसी नेशनल असेम्बली द्वारा 1789 में दी डिक्लेरेशन ऑफ राइट्स ऑफ मैन को अपनाया गया था। फ्रांस की जनता मानव अधिकारों के प्रति इतनी सजग थी कि वहाँ लुई सोलहवें को इसलिए फाँसी पर चढ़ा दिया गया था क्योंकि उसने जनता के मूल अधिकारों का उल्लंघन किया था। भारत के संविधान में भी कुछ मूल्यवान अधिकार निर्धारित है |

installment payments on your स्वतंत्रता का अधिकारः-(अनुच्छेद 19 से twenty-two तक) –

  • अनुच्छेद 19 के अनुसार नागरिक को 6 प्रकार की स्वतंत्रतायें दी गई है –
  • अनुच्छेद 19(A) – भाषण और विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। अनुच्छेद 19(1) के अन्तर्गत प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है । इसी के तहत देश के नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज को फहराने की स्वतंत्रता दी गई है! संविधान के प्रथम संशोधन अधिनियम 51 के द्वारा विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है। सरकार राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक कानून व्यवस्था, सदाचार, न्यायालय की अवमानना, विदेशी राज्यों से संबंध तथा अपराध के लिए उत्तेजित करना आदि के आधार पर विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकती है।
  • अनुच्छेद 19(B) के तहत शांतिपूर्ण तथा बिना हथियारों के नागरिकों को सम्मेलन करने और जुलूस निकालने का अधिकार होगा । राज्यों की सार्वजनिक सुरक्षा एवं शान्ति व्यवस्था के हित में इस। स्वतंत्रता को सीमित किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 19(C) भारतीय नागरिकों को संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता दी गई हैं! लेकिन सैनिकों को ऐसी स्वतंत्रता नहीं दी गई है
  • अनुच्छेद 19(D) देश के किसी भी क्षेत्र मे स्वतंत्रता पूर्वक भ्रमण करने की स्वतंत्रता ।
  • अनुच्छेद 19(E) देश के किसी क्षेत्र में स्थाई निवास की स्वतंत्रता। (जम्मू कश्मीर को छोड़कर)
  • अनुच्छेद 19(G) कोई भी व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता ।
  • अनुच्छेद 20 के अनुसार अपराधों के लिए दोष सिद्धि के संबध में संरक्षण दिया गया है1 ) किसी भी व्यक्ति को तब तक अपराधी नहीं माना जाएगा जब तक यह सिद्ध न हो जाये कि उसने किसी कानून का अल्लंघन किया है ।2 . किसी व्यक्ति को किसी अपराध के लिए उससे अधिक दण्ड नहीं दिया जा सकता ।3. किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक दण्ड नहीं दिया जा सकता ।4. किसी भी व्यक्ति को स्वयं अपने विरूद्ध गवाही देने या सबूत पेश करने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता ।
  • अनुच्छेद 21 के अनुसारः- किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अतिरिक्त उसके जीवन और शरीर की स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता ।
  • अनुच्छेद 21(क) के अनुसार 86वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है ।
  • अनुच्छेद 22 के अनुसार किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता और गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घण्टे के अन्दर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है ।

स्वतंत्रता का अधिकार (RIGHT TO FREEDOM)

यह अनुच्छेद 11-12 में वर्णित है। इस अधिकार के अंतर्गत देश में कही पर जाकर जीविकोपार्जन कर सकते है, कही भी निवास कर सकते है, देश के नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी है। देश में कही भी आने जाने की आजादी है।

यूनियन बनाने, संघ बनाने का अधिकार है। पर किसी ऐसे संघ को नही बना सकते जो देश को हानि पहुँचाता हो। देश के नागरिकों को अपराध करने पर दोषसिद्धि होने तक संरक्षण है।

शांतिपूर्वक बिना हथियार के एकत्रित होने और सभा करने की आजादी है। अपनी पसंद का व्यवसाय करने की आजादी है। देश के किसी भी हिस्से में सम्पत्ति खरीदने, बनाने और बेचने का अधिकार है।

किसी व्यक्ति को एक बार अपराध के लिए two बार दोषी नही ठहराया जा सकता है। किसी भी व्यक्ति को स्वयं के खिलाफ गवाह के रूप में खड़ा करने के लिए मजबूर करने की अनुमति नही है। देश में किसी भी स्थान पर भ्रमण करने का अधिकार है।

मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण

भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का वर्णन संविधान के तीसरे भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक किया गया है। इन अधिकारों में अनुच्छेद doze, 13, 33, 34 तथा 35 क संबंध अधिकारों के सामान्य रूप से है। 44 वें संशोधन के पास होने के पूर्व संविधान में दिये गये मौलिक अधिकारों को सात श्रेणियों में बांटा जाता था परंतु इस संशोधन के अनुसार संपति के अधिकार को सामान्य कानूनी अधिकार बना दिया गया। भारतीय नागरिकों को छ्ह मौलिक अधिकार प्राप्त है: –

1 . समानता का अधिकार: अनुच्छेद 16 से 18 तक।2 . स्वतंत्रता का अधिकार: अनुच्छेद 19 से 22 तक।3. शोषण के विरुध अधिकार: अनुच्छेद 23 से 24 तक।4. धार्मिक स्वतंत्रता क अधिकार: अनुच्छेद 25 से 28 तक।5. सांस्कृतिक तथा शिक्षा सम्बंधित अधिकार: अनुच्छेद 29 से 31 तक।6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार: अनुच्छेद 32